क्या नीतीश को मुख्यमंत्री बनने से रोक पाएंगे चिराग पासवान ?

बिहार अब पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है. प्रथम चरण के लिए नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है. राज्य की सभी पार्टियां प्रत्याशियों की घोषणा करने लगी हैं. लेकिन फिलहाल बिहार की सियासत में अगर कोई नेता और पार्टी सर्वाधिक सुर्खियां बटोर रही है तो वो है चिराग पासवान और उनकी पार्टी लोजपा यानि लोक जनशक्ति पार्टी. 2014 से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रहे लोक जनशक्ति पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनावॉ से ठीक पहले राजग का साथ छोडकर अकेले चुनाव मैदान में उतरने का फैसला कर लिया है. ऐसा नहीं है कि चिराग पासवान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोई समस्या है राष्ट्रीय राजनीति में वे अभी भी राजग के साथ बने हुए हैं. लेकिन बिहार में उन्होने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना करते हुए राजग गठबंधन से अलग हो चुके हैं. चिराग पासवान नीतीश कुमार से कितने खफा हैं इस बात का अंदाजा चिराग के उस ऐलान से लगाया जा सकता है कि लोजपा बिहार के उन सभी सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी जिस पर नीतीश कुमार की पार्टी जदयू चुनाव लड़ेगी. हालांकि भाजपा के साथ सीट बँटवारे में 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में जदयू को 122 सीटें मिली हैं और चिराग पासवान ने बिहार के 143 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा की जदयू के 122 सीटों के अलावा चिराग और कौन सी 21 सीटों पर चुनाव लड़ते हैं क्योंकि चिराग ने 143 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है.

 

आखिर क्या है चिराग की मंशा ?

चिराग पासवान के एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने के फैसले को राजनीतिक पंडित अपने अपने नजरिए से देख रहे हैं. लोजपा से जुड़े रणनीतिकारों का कहना है कि वक़्त आ गया है कि बिहार का नेतृत्व किसी युवा के हांथों में सौंपा जाए यानि लोजपा के रणनीतिकार चिराग पासवान को बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं. लेकिन इस तर्क में उतना दम नज़र नहीं आता क्योंकि अगर चिराग पासवान के मन में बिहार का मुख्यमंत्री बनने की इच्छा है तो फिर उन्हें सबसे पहले बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ना होगा. नीतीश के साथ मोदी से भी दूरी बनानी होगी और ज़मीन पर अपनी ताकत बढ़ानी होगी, क्योंकि 2002 में राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापित लोजपा अभी भी बिहार में एक मजबूत विकल्प के रूप में नहीं उभर पाई है और विधानसभा चुनावों में लोजपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है.. इसलिए चिराग पासवान को लोजपा द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री रूप में प्रोजेक्ट करने वाले दावे में दम कम नज़र आता है.

बिहार की आबोहवा में लोजपा से संबन्धित एक और समीकरण तैर रहा है, जिसके पीछे भाजपा की भूमिका बताई जा रही है. और इस दावे में दम नज़र आता है. राजनीतिक जानकारों के अनुसार पिछले 15 वर्षों से भाजपा बिहार में नीतीश कुमार के पीछे पीछे चल रही है और छोटे भाई की भूमिका में है लेकिन अब भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आना चाहती है और बिहार में अपना मुख्यमंत्री चाहती है. भाजपा अपने इस योजना के क्रियान्वयन के लिए नीतीश कुमार से अलग होकर चुनाव नहीं लड़ सकती क्योंकि भाजपा को पता है कि बिहार में फिलहाल नीतीश कुमार ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनका जनाधार सबसे ज्यादा है इसलिए नीतीश कुमार को अलग कर भाजपा सत्ता तक नहीं पहुँच सकती, इसका अंदाजा बिहार के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को हो भी गया था जब नीतीश कुमार ने लालू यादव के साथ मिलकर भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया था. इसलिए इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने लोजपा को अपने सत्ता तक पहुँचने का जरिया बनाया है. वरना क्या वजह है कि 2019 में नीतीश के साथ लोकसभा चुनाव लड़ने वाले चिराग पासवान को एक साल के अंदर ही नीतीश बुरे लगने लगे, भ्रष्टाचारी लगने लगे. जबकि उसी गठबंधन में शामिल भाजपा से चिराग को कोई दिक्कत नहीं है. लोजपा क्यों सिर्फ जदयू के खिलाफ ही चुनाव लड़ रही है? चिराग ये भी कह रहे हैं कि चुनावों के बाद उनका गठबंधन भाजपा से ही होगा. ये सभी समीकरण इस बात की ओर ईशारा करते हैं कि बिहार विधानसभा में लोजपा का अघोषित गठबंधन भाजपा के साथ है. भाजपा को ये बात अच्छी तरह पता है कि लोजपा बहुत ज्यादा सीटें शायद ही जीते लेकिन इतना तय है कि लोजपा नीतीश के विरुद्ध चुनाव लड़ के उन्हें बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है और अगर ऐसा होता है और भाजपा जदयू से ज्यादा सीटें जीत जाती है तो फिर भाजपा राज्य में अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए नीतीश पर दबाव बनाने की स्थिति में होगी.

 

लोजपा का राजनीतिक सफर

वर्ष 2000 में रामविलास पासवान द्वारा स्थापित की गयी लोजपा का राजनीतिक सफर उतार चढ़ावों से भरा रहा है. अगर बिहार विधानसभा चुनावों में लोजपा का प्रदर्शन देखा जाए तो लोजपा बहुत ज्यादा उम्मीद जगाती नहीं दिखती है.  लोजपा ने बिहार में सबसे पहला विधानसभा चुनाव 2005 में लड़ा था और अबतक का सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हुए 29 सीटें जीती थीं पार्टी ने उसके बाद 2005 में ही राष्ट्रपति शासन के बाद दूसरा, 2010 में तीसरा, 2015 में चौथा विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन अपने पहले चुनाव के प्रदर्शन को दुहराना तो दूर लोजपा का ग्राफ चुनाव दर चुनाव गिरता रहा. पार्टी दहाई अंकों में पहुँचने के लिए संघर्ष करती रही. आलम यह रहा कि लोजपा के सांसदों की संख्या विधायकों से अधिक होती है.

अवसरवादी पार्टी की छवि

लोजपा पर अवसरवादी पार्टी होने का आरोप भी लगता रहा है. लोजपा हर चुनाव अलग गठबंधन के साथ लड़ती है चाहे वो लोकसभा हो या विधानसभा. पार्टी अपने राजनीतिक पार्टनर बदलती रही है. इसलिए कहा जाता है कि सरकार किसी भी गठबंधन की हो रामविलस पासवान केंद्र में मंत्री जरूर रहेंगे.

इस बार के विधानसभा चुनावों में भी लोजपा भाजपा को फायदा पहुँचाने के लिए सिर्फ उन्हीं सीटों पर चुनाव लड़ रही है जिस पर नीतीश की पार्टी चुनाव लड़ेगी. अब देखना ये है कि क्या चिराग पासवान भाजपा द्वारा बिछाए गए रणनीतिक बिसात पर सफल होकर नीतीश को नुकसान पहुंचा पाते हैं या नीतीश चिराग और भाजपा द्वारा बनाए गए इस रणनीतिक चक्रव्यूह को भेद कर एक बार फिर मुख्यमंत्री कुर्सी पर विराजमान होते हैं.  

By Pankaj Kumar